हिंदी उर्दू एक ही मां को दो सन्तान
यह हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार करने के लिए एक अहम दिन कह सकते है। हिंदी देश की सांस्कृतिक एकता को दर्शाती है।
आज ही के दिन 1949 को देश की राष्ट्र भाषा हेतु मतदान हुआ था और हिंदी उर्दू दोनों के पक्ष में बराबर बराबर मत पड़े थे परन्तु देश के पहले राष्ट्रपति ने अपना एक मत हिंदी के पक्ष में दिया था
सगी बहनों का रिश्ता है जो उर्दू और हिंदी में, कहीं दुनिया की दो ज़िन्दा ज़बानों में नहीं मिलता।

सैयद आसिफ इमाम काकवी
हिंदी हैं हम,वतन है सारा जहाँ हमारा आज हिंदी दिवस है हर साल 14 सितंबर को भारत में हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार करने के लिए एक अहम दिन कह सकते है। हिंदी देश की सांस्कृतिक एकता को दर्शाती है। यह दिन हमें हमारी सांस्कृतिक धरोहर की याद दिलाता है और नई पीढ़ी को अपनी मातृभाषा के प्रति गर्व महसूस कराता है। इस दिन विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जिससे हिंदी का महत्व और भी बढ़ जाता है। आज ही के दिन 1949 को देश की राष्ट्र भाषा हेतु मतदान हुआ था और हिंदी उर्दू दोनों के पक्ष में बराबर बराबर मत पड़े थे परन्तु देश के पहले राष्ट्रपति ने अपना एक मत हिंदी के पक्ष में दिया था परिणाम स्वरूप हिंदी को राष्ट्र भाषा का दर्जा प्राप्त हुआ और उर्दू मात्र एक वोट से राष्ट्र भाषा का दर्जा प्राप्त नहीं कर सकी, आज हम देखते हैं तो ये महसूस नहीं कर पाते कि हिन्दी को राजभाषा का दर्जा मिलना इतना भी आसान नहीं था। भारत में सैंकड़ों भाषाएं बोली और लिखी जाती हैं। इनमें से कई भाषाओं का दावा था कि वे किसी भी तरह हिन्दी से कम नहीं हैं। न तो उनके बोलने वाले कम थे न ही उनका इतिहास हिन्दी से नया था। बंगाली एक प्रमुख दावेदार थी इसके साथ ही उर्दू भी थी। उर्दू का किस्सा तो और भी अनोखा था क्योंकि देखा जाये तो हिन्दी और उर्दू में उत्तर भारत में लिपि के अलावा फ़र्क़ कर पाना मुश्किल हो जाता था। ख़ैर क़ानून बना और हिन्दी राजभाषा बनी। साल 1953 में, पहली बार 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया गया था। इसका उद्देश्य हिंदी भाषा के महत्व और प्रसार को बढ़ावा देना था। मेरी मात्र भाषा तो हिंदी नहीं है परन्तु मेरा स्वभाग्य है की इस भाषा से विशेष रूचि रही है और विगत 2 दशको से मै राज्य और देश के पर्मुख पात्र पत्रिकाओ में निरंतर छपता रहा हु हिंदी देश की सशक्त भाषा है अपने अभी व्यक्ति को अधिकांश लोगों तक पहुचाने का सशक्त माध्यम है, हमारी हिंदी ‘अ ‘अनपढ़ से शुरू होकर हमें ‘ज्ञ ‘ ज्ञानी तक ले जाती है! हमारी हिंदी में ऊंच -नीच का भेद नहीं होता क्योंकि इसमें ना कोई केपिटल अक्षर होते हैं और ना कोई स्मॉल अक्षर होते हैं, साथ ही आधे अक्षर क़ो सहारा देने के लिए पूरा अक्षर.. हमेशा तैयार होता है.
सैय्यद आसिफ इमाम काकवी


