सूफी संतों का आस्ताना और गन्द का खजाना?
दरगाह परिसर में बने नए भवन विश्रामग्रह सालो से बंद पड़े हैं
जबकी कई प्रदेशो से आने वाले ज़ायरीन (श्रद्धालु) आज भी खुले में सोने को मज़बूर हैँ, शौच एवं जल की सुचारु सुविधा ना होने के कारण दरगाह के पिछले हिस्से में मौजूद जलाशय में जाना पड़ता है
देश की प्रथम महिला सूफ़ी संत की दरगाह पर सूफ़ी संतो के परम्पराओ के विरुद्ध जा कर मनाया जा रहा है सूफ़ी महोत्सव…

ताबिश वारसी
मैनेजर :-आस्ताना हज़रत बाबा जमाल शाह वारसी – नगर पंचायत काको
जहानाबाद काको :- देश की प्रथम महिला सूफ़ी संत हज़रत बीबी कमाल (र.अ) का 727 वॉ उर्स आगामी 12 -13 सितम्बर को काको प्रखंड स्तिथ दरगाह पर मनाया जा रहा है जिसको लेकर चाक-चौबंद सजाया गया है, लेकिन दरगाह परिसर में बने नए भवन विश्रामग्रह सालो से बंद पड़े हैं जबकी कई प्रदेशो से आने वाले ज़ायरीन (श्रद्धालु) आज भी खुले में सोने को मज़बूर हैँ, शौच एवं जल की सुचारु सुविधा ना होने के कारण दरगाह के पिछले हिस्से में मौजूद जलाशय में जाना पड़ता है ध्यान देने योग बात यह है के इस सूफ़ी महोत्सव में सरकार द्वारा स्थानीय काको के सूफ़ी परंपरा को मानने वाले खानकहो एवं दरगाह के रहनुमाओ को पूरी तरह से अनदेखा किया जाता है ऐसा महसूस होता है यह यह कार्यक्रम सरकार द्वारा सरकार के लिए और सरकारी अधिकारियो के लिए आयोजित किया जाता है कार्यक्रम में मुस्लिम धर्मगुरु एवं दरगाह कमिटी के सदस्यों को छोड़ कर अधिकारीयों को सम्मानित किया जाता है,वर्ष 2011 में बिहार सरकार द्वारा हज़रत बीबी कमाल र.अ को देश की पहली सूफ़ी संत तौर पर मान्यता दी गई और उनके बरसी के मौके पर मुख्यमंत्री द्वारा हर वर्ष सूफ़ी महोत्सव मनाने की घोषणा की गई थी बिहार सरकार के पर्यटन विभाग ने दरगाह को सूफ़ी सर्किट से जोड़कर विकास की कई परियोजनाए को शुरू की गई थी जो आज तक आपूर्ण है दरगाह कमिटी के सदस्यों कहना है की यह उर्स उनके दरगाह के बजाए, 500 मीटर दूर एक मैदान में आयोजित किया जा रहा हैं। ज़बकि उनका आस्ताना सूना पड़ा है, रौशनी तक नहीं, यह तो वही बात हो गई के दुल्हे का घर छोड़ कर पूरे गाँव सज़ा दिया गया है जो बिल्कुल निंदनीय है हर साल सूफ़ी महोत्सव में आने वाले कलाकार सूफ़ी संगीत को छोड़ कर बॉलीवुड के फिल्मो के गाने पेश करते हैं जो की दरगाह हज़रत बीबी कमाल र.अ की शिक्षा एवं सूफ़ी उद्देश्यों के बिल्कुल विपरीत कार्यक्रम होना कहीं ना कहीं सूफ़ी परम्परा को ठेस पहुंचना है कार्यक्रम में विशेष तौर पे मुस्लिम धर्मगुरु द्वारा सुफियों द्वारा दिए गए पाठ को दोहराना एवं उनके बारे में विस्तार से बताना होता है इसका एक और माध्यम है वो है सूफ़ी क़व्वाली जिनमे अमीर खुसरो, हज़रत बेदम शाह वारसी, औघाट शाह वारसी जैसे महान सूफ़ी संतो द्वारा लिखी गई ग़ज़ल को क़व्वाली के तौर पर पढ़ कर सुनाया जाता है जिसको सुन कई बुज़ुर्ग कई संतो को हाल एवं खाल की आवस्था में आ जाते थे और क़व्वाली में विलीन हो जाते थे अब तक कोई भी ऐसा कार्य नहीं किया गया हैं जिससे आवाम सूफ़ी संत को उद्देश्यों को समझ सके एवं उनके रास्ते पर खुद को पूरी तरह ढाल सके..

