सोशल मीडिया पर देशविरोध का कारोबार: अभिव्यक्ति की आज़ादी या एजेंडा मार्केटिंग?”
देश में विचारों की आज़ादी संविधान से संरक्षित है। लेकिन क्या यह आज़ादी इतनी खुली हो कि कोई भी कुछ भी कह दे, और जब सवाल उठे तो ‘डेमोक्रेसी’, ‘फ्री स्पीच’ और ‘डिसेंट’ की आड़ ले ले? क्या राष्ट्रविरोधी कंटेंट को भी अभिव्यक्ति का हिस्सा मान लेना चाहिए?
कलम अब ज़िम्मेदार हो – साहित्य, पत्रकारिता, मीडिया और सोशल स्पेस — ये सब लोकतंत्र की रीढ़ हैं। लेकिन जब यही प्लेटफॉर्म विदेशी एजेंडों या राजनीतिक नफ़रत से ग्रस्त हो जाएं, तो उन्हें शुद्ध करना ही राष्ट्र की सुरक्षा का हिस्सा बन जाता है। अब समय आ गया है कि कलम भी ज़िम्मेदारी के साथ चले। हर पोस्ट से पहले, हर ट्वीट से पहले, हर वीडियो से पहले खुद से पूछिए — क्या ये मेरे देश के पक्ष में है या विपक्ष में? अगर जवाब स्पष्ट नहीं है — तो पोस्ट मत कीजिए।
सोशल मीडिया पर देशविरोध का कारोबार: अभिव्यक्ति की आज़ादी या एजेंडा मार्केटिंग?”

सोशल मीडिया पर ‘पेआउट’ लेकर भारत को बदनाम करने वालों की अब खैर नहीं। IT एक्ट 2000 और डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड 2021 के तहत सरकार ने सख़्त रुख अपनाया है। अब देशविरोधी कंटेंट पर न तो चुप्पी होगी, न छूट। अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर अफवाह फैलाने और एजेंडा चलाने वालों पर कानूनी शिकंजा कसेगा। ये तय नहीं होगा कि आप किस पार्टी के समर्थक हैं, बल्कि ये देखा जाएगा कि आपके विचार भारत की अखंडता के साथ हैं या उसके खिलाफ़। अब पोस्ट से पहले सोचिए – देश पहले है, लोकप्रियता नहीं!


