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मृत्यु का मर्म और मोक्ष का मेला”

कभी कहते — "भीड़ में मरे तो मोक्ष मिलेगा", अब कहते — "भीड़ से डर है, व्यवस्था कड़ी रखो भैया।" क्या यही है त्याग? यही सन्यास? या है धर्म अब एक सुरक्षित विकास?
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पाखंडी बाबा – मुख पर राम राम बगल में छुरी

बाबा यदि वाकई आत्मा की अमरता में विश्वास रखते हैं, तो उन्हें सबसे पहले वाई श्रेणी सुरक्षा का त्याग करना चाहिए — क्योंकि असली संत वही है, जो सत्य के साथ निर्भय खड़ा हो।
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प्राकृति से छेड़-छाड़ के कारण वर्षा के बदल जाते हैं पैटर्न प्राकृति आपदाओं की भी बढ़ जाती है आवृति

क्योंकि, पेड़ की कटाई से कई तरह के नुकसान हो रहे हैं। साइंस का मानना है कि पेड़ न रहने के कारण पर्यावरण, पारिस्थितिकी तंत्र, जलवायु और मानव जीवन पर कई प्रकार के प्रभाव होते हैं।
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पत्रकारिता के माध्यम से बाबा साहेब ने की वैचारिक क्रांति: प्रो.संजय द्विवेदी

भारतीय विदेश नीति एवं सुरक्षा, श्रम सुधारों, सिंचाई व जल प्रबंधन एवं भाषा नीति आदि सभी विषयों पर उनके विचार एवं कार्य आज भी प्रासंगिक है।
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प्राइवेट सिस्टम का खेल: आम आदमी की जेब पर हमला

भारत एक ऐसा देश है जहाँ शिक्षा और स्वास्थ्य को बुनियादी अधिकार माना जाता है। लेकिन जब यही अधिकार एक व्यापार का रूप ले लें, तो आम आदमी की जिंदगी में यह अधिकार बोझ बन जाते हैं।
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जाति की जंजीरें: आज़ादी के बाद भी मानसिक गुलामी आस्था पेशाब तक पिला देती है, जाति पानी तक नहीं पीने…

यह सवाल उठाता है कि यदि आस्था किसी बाबा की पेशाब को ‘पवित्र’ मान सकती है, तो एक दलित का पानी ‘अपवित्र’ कैसे हो सकता है? यह कैसा धर्म है?
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स्वार्थी मुसलमानों की महफील ईद मिलान में बिहार के मुख्यमंत्री सुसाशन बाबू नीतीश कुमार

अब नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री का चेहरा रखना भाजपा के लिए सम्भवता मुश्किल हो, परन्तु बिहार में भाजपा के पास मुख्यमंत्री का कोई चेहरा भी नही है।
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मौलाना अली हुसैन आसिम के जन्म दिवस को पसमांदा यौम-ए-इत्तेहाद (Solidarity Day) के रूप में मनाया जाए:…

जब दलित मुस्लिम, ओबीसी मुस्लिम और पसमांदा तबक़ात आला तालीम याफ़्ता होंगे, अपनी मजबूत तन्ज़ीम बनाकर बुनियादी और आइनी हुक़ूक़ के लिए मुत्तहिद होकर जद्दोजहद करेंगे।
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*एचकेआरएनएल कर्मचारियों की दुर्दशा: सरकारी व्यवस्था का एक और छलावा* 

सरकार को तुगलकी फरमान वापस लेना चाहिए और इन कर्मचारियों के लिए नौकरी की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। यदि सरकार इस दिशा में कदम नहीं उठाती, तो यह हजारों परिवारों की आर्थिक स्थिति पर गहरा प्रभाव डालेगा। 
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