“लगाओ आग न उन बेमकीं मकानों को। कि शोला आप के खिरमन को भी जला देगा।।”
डॉ. अजय मालवीय "बाहर इलाहाबादी" भारतीय अस्मिता एवं संस्कृति का सम्मानजनक ढंग से हिंदी और उर्दू में समान रूप से विवेचन किया है।
डॉ. अजय मालवीय “बाहर इलाहाबादी” भारतीय अस्मिता एवं संस्कृति का सम्मानजनक ढंग से हिंदी और उर्दू में समान रूप से विवेचन किया है और भारतीय संस्कृति और सभ्यता को उन्होंने इसके माध्यम से उभारा है।
समीक्षा

ज़र्द मौसम का सफर : सच्ची ग़ज़लों की नई शुरुआत
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पंडित राकेश मालवीय मुस्कान

ज़र्द मौसम का सफ़र डॉक्टर अजय मालवीय बहार इलाहाबादी की एक अप्रतिम पुस्तक है। वैसे तो ग़ज़लों की अपनी ही दुनिया होती है। उर्दू शायरी प्रेम को मन से प्रकट करने की विधा है। छोटी-बड़ी बात को एक मिसाल की तरह प्रकट करना। जो कहीं-न-कहीं दिल को छू जाती है। यह विधा हिन्दी के दोहों में पाई जाती है। इसके अपने नियम हैं। दो पंक्ति में बड़ी बात को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
एक जमाने में ग़ज़ल सिर्फ श्रृंगार रस में नायिकाओं के खूबसूरत सौंदर्य के वर्णन का साधन हुआ करती थी। कालांतर में धीरे-धीरे उसका विस्तार हुआ और ग़ज़ल हर संजीदा चीज को खास अंदाज में कह देने की विधा बन गई। उर्दू के मर्मज्ञ डॉक्टर अजय मालवीय बहार इलाहाबादी ने ग़ज़लों पर न केवल अपना हाथ आजमाया है, बल्कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता को उन्होंने इसके माध्यम से उभारा है। डॉक्टर बाहर इलाहाबादी की एक और विशेषता यह रही है कि उन्होंने भारतीय अस्मिता एवं संस्कृति का सम्मानजनक ढंग से हिंदी और उर्दू में समान रूप से विवेचन किया है। यह उनकी बड़ी देन है, उपलब्धि है। इसके माध्यम से उन्होंने सांस्कृतिक सीमाओं को एक किया है। उर्दू और हिंदी के बीच की खाई को पाट करके ग़ज़ल के माध्यम से उन्होंने लोगों के दिलों को जोड़ा है।
डॉ अजय मालवीय बहार इलाहाबादी ग़ज़ल के एक अनमोल एवं चमकदार सितारे हैं। यहां देखना अत्यंत मजेदार होगा कि उनकी शायरी की रंगत, उसकी खुशबू कैसी और उसका मिजाज़ कैसा है। उसकी खूबी कैसी है और उनका अंदाज़े-बयां कैसा है। बहार इलाहाबादी उर्दू में ऐसी ऐसी शायरी करते हैं जिसमें हिंदुस्तान की माटी की खुशबू है, यहाँ की हवाओं की लचक है, यहाँ की ज़मीन और यहाँ के आकाश का अक्स है। बहार इलाहाबादी ने जो ग़ज़ल कही उसमें हिंदुस्तान की आत्मा धड़कती है, भारतीयता का पूरा परिदृश्य नृत्य करता है। उनकी ग़ज़लों में हिंदी की आसान शब्दावली है जिसे कोई भी आसानी से समझ सकता है। उन्हें संस्कृत के तत्सम शब्दों से भी न कोई परहेज है, न ही कोई हिचक। ग़ज़ल के बारे में उनके कुछ शेर देखिए-
उसके होंठों की हँसी का ये असर मुझ पे हुआ।/मेरी ग़ज़लों में वही शोख़ जवानी आई।। ऐसे मंज़र कभी भूले नहीं जाते हैं ‘बहार’।/देखकर जिनको मुझे बात बनानी आई।।
आगे वे बड़ी बेबाकी से कहते हैं:—“लगाओ आग न उन बेमकीं मकानों को। कि शोला आप के खिरमन को भी जला देगा।।”
डाॅक्टर अजय मालवीय बहार इलाहाबादी ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि उनकी ग़ज़लों में ऐसी तनवीर अता करें जिससे दुनिया रौशन हो जाय। देखिए — हम तो वह हैं कि बदल देते हैं दुनिया का चलन।/मौज के रुख को पलटने का भी रखते हैं दिमाग।।/मेरी ग़ज़लों को तू तनवीर अता कर यारब।/जिससे रौशन रहे हर दम सुखनो शेर का।।”
डाॅक्टर बहार इलाहाबादी के बारे में हम दावे के साथ कह सकते हैं कि वे फार्मूला वाली शायरी नही करते। बल्कि वे भाव, विचार या बात को आगे ले जाने की प्रक्रिया में शायरी कर जाते हैं। उनकी ताक़त उनका ’कंटेंट’ या कथ्य है। ग़ज़ल में वो बात को जिस ऊँचाई पर ले जाते हैं, वह काबिले तारीफ़ है। उनके कुछ शेर इस तरह से हैं — पत्थर की है रूकावटें फूलों की राह में।/उम्मीदे दिल के आईने सब चूर हो गये।।/भेजे थे हमने फूल तो काँटे हमें मिले।/सीने में जितने ज़ख्म थे नासूर हो गये।।”
बहार इलाहाबादी आँख बंद करके शायरी नहीं करते। अपने आसपास की घटनाओं और सियासत पर पैनी नज़र रखते हैं। उनकी शायरी में हालातेओं का ज्यों का त्यों वर्णन मिलता है। वे मन बहलाने के लिए शायरी नहीं करते, समय से संवाद भी करते हैं। वे आँख बंद करके दुनिया को नहीं देखते, खुली आँखों से देखते हैं। कुछ शेर हाजिर हैं— “तमाम शहर हैं वीरान खंडहरों की तरह। /कि मकानों में आज कुछ नहीं घरों की तरह।।/पड़ा है साबक़ा किन बेहिसों से आज हमें। /कि सारे लोग यहाँ के हैं पत्थरों की तरह।”
हो रही गंदी सियासत आज के इस दौर में।/ऐसे नाक़िस रहबरों से अब निपटना चाहिए।।/उसके आने की ख़बर है आज मेरे घर ‘बहार’।/फिर चमन में फूलों की खुशबू महकना चाहिए।।
इसी तरह बहार इलाहाबादी ऊँचाई से ग़ज़ल कहने की हिम्मत करने वाले शायर हैं। वे इशारे इशारे में ऊँची बात बड़ी सफ़ाई से कह जाते हैं। कुछ शेर देखिए — ऐ जिंदगी बता कि निकलना है कितनी दूर। /कश्ती को बहरे खुश्क पे चलना है कितनी दूर।।/अपनी तलाश में ही मैं भटका इधर उधर । /मुझको तमाम उम्र भटकना है कितनी दूर ।।
अंत में यही कहा जा सकता है कि बहार इलाहाबादी की बेमिसाल ग़ज़लगो हैं। इनके सामने बहुत सारे दरवाजे हैं, खिड़कियाँ हैं, रोशनदान हैं। बड़ी से बड़ी बात को सलीके से और बारीक इशारे में कह देना ही उन्हें बड़ा शायर बनाता है। वे केवल ग़ज़ल की नक्काशी नहीं करते उस नक्काशी के अंदर अपने विचारों के बहुमूल्य रत्नों को भर देते हैं। उनके लिए ग़ज़ल एक माध्यम है अपनी बात को कहने का। वो शिक्षा से ज्यादा चिंता करने वाले शायर हैं। जीवन और जगत के बारे में काफी कुछ सोचते विचारते हैं। उनका कलाम पढ़ने पर फिक्र के नए – नए दरीचे खुलते हुए महसूस होते हैं। उनके शेर अक्सर अछूते खयालों को लेकर सामने आते हैं। उन्हीं के कुछ शेर से बात पूरी करता हूँ। देखिए — भूखा प्यासा रहा परिंदा मगर।/दाना चुगने कभी नहीं उतरा।।/मिरे हाथ में जब से देखा है खंजर। /तो दुश्मन भी हाथ अब मिलाने लगे हैं।।
/बहार’ आज फूलों का क्या ज़िक्र कीजे। /कि काँटे भी दामन बचाने लगे हैं।।
इस तरह से यह कहा जा सकता है कि डॉक्टर अजय मालवीय बहार इलाहाबादी की ज़र्द मौसम का सफर पाठकों के अनुकूल मौसम में ले जाती है। और वे अपनी बात गहराई के साथ लोगों के दिलों में पैवस्त कर देती है। मुझे उम्मीद है कि पाठकों को इसे पढ़ने से कोई निराशा नहीं हासिल होगी, बल्कि ने एक नई ताजगी और रोशनी मिलेगी। मेरी इनके लिए शुभकामनाएँ हैं।
पंडित राकेश मालवीय मुस्कान
कवि, लेखक और विचारक


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