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#urdulitrature

बशीर बद्र को आख़िरी सलाम -उर्दू अदब का एक रोशन चिराग बुझ गया।

दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,** जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।" ** जी बहुत चाहता है सच बोलें,** **क्या करें हौसला नहीं होता।"
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मुस्लेमीन बिहार की नज़र अब तक इमारतें शरियाः पर टिकी

लेकिन इसके फैसलों के मज़हबी, सामाजिक और राजनीतिक असरात दूर तक जाएंगे। मुस्लिम समाज की निगाहें इस वक़्त पटना की सरज़मीं पर टिकी हुई हैं।
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बिहार को नाम नहीं, काम चाहिए: नीतीश जी, अब जनता मूर्ख नहीं है!

आपने भाजपा से ‘जुमला राजनीति’ तो सीख ली, लेकिन ये भूल गए कि बिहार के लोग अब सोशल मीडिया और ज़मीनी हकीकत – दोनों को समझने लगे हैं। उन्हें सिर्फ नाम नहीं, काम चाहिए। गयाजी बन जाने से न पर्यटन बढ़ेगा, न रोज़गार मिलेगा। बिहार को चाहिए योजनाएं,…
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“सीमा पर तनाव है, देशवासियों में डर है… और गोदी मीडिया फेक न्यूज़ में मशगूल है!”

सीमा पर तनाव, महंगाई, बेरोजगारी, गिरती अर्थव्यवस्था पर न कोई बहस होती है, न सवाल। गोदी मीडिया की स्क्रीन पर बस चल रहा है:
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ज़श्न-ए-उर्दू 2025: अदब, तहज़ीब और मोहब्बत का कारवां

उर्दू, अदब, सभ्यता, संस्कार अब मंचो, सम्मेलनों, मुशायरों की शोभा बन कर रह गयी है, घरों से उर्दू अदब, सभ्यता, संस्कार सब गायब हो गई - दानिशमंद, बशाऊर लोगों की रखैल बन कर रह गयी।
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एशिया के सब से बड़े लिटरेचर फेस्टिवल में बिहार के क़ासिम खुर्शीद का प्रभावशाली प्रतिनिधित्व

जबकि साहित्य अकादमी में उर्दू प्रसिद्ध शायर एवं उर्दू साहित्यकार गोपी चंद नारंग साहब के बाद उर्दू साहित्यकार एवं शायर जनाब चंद्रभान ख्याल साहब को ङ्कि जगह मिली तो लेकिन उर्दू सम्पादक शायेद साहित्य अकादमी को अबतक नहीं मिला?
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होली, ईद, दीपाली आपसी भाईचारा प्यार सौहार्द और सद्भावना का प्रतीक है , न कि नफरत फैलाने का।

होली, रमज़ान, या होली के दिन जुमा या कभी ईद तो कभी बख्रीद का त्योहार सदियों से साथ आता है और हम भारतीय हिंदुस्तानी इंडियन साथ मिल कर सद्भावनापूर्ण, सौहार्दपूर्ण मिल कर खुशयां बांटते आये हैं।
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