मुस्लेमीन बिहार की नज़र अब तक इमारतें शरियाः पर टिकी
यह स्पष्ट हो जाएगा कि किसका साथ उम्मत के हक में है और कौन इसे कमज़ोर करने की साज़िशों में शामिल है।
लेकिन इसके फैसलों के मज़हबी, सामाजिक और राजनीतिक असरात दूर तक जाएंगे। मुस्लिम समाज की निगाहें इस वक़्त पटना की सरज़मीं पर टिकी हुई हैं।
इमारत-ए-शरीअत के इतिहास में आज का दिन दर्ज़ होगा – फैसलों, बेचैनियों और उम्मीदों का दिन


सैय्यद आसिफ इमाम काकवी
पटना, 25 मई 2025: आज का दिन इमारत-ए-शरीअत बिहार, झारखंड, उड़ीसा और बंगाल के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ की तरह याद किया जाएगा। مجلسِ ارباب حل و عقد (मजलिस-ए-अरबाबे हल व अक़्द) की अहम बैठक आज सुबह से ही फुलवारी शरीफ़ स्थित अल-महदुल आली, इमारत-ए-शरीअत में जारी है।
सैकड़ों की संख्या में जिम्मेदार, आलिम-ए-दीन, कारकुनान और आम लोग सुबह से ही इस ऐतिहासिक बैठक का हिस्सा बनने के लिए इकट्ठा हो गए। पूरे परिसर में एक अजीब सी बेचैनी और उत्सुकता महसूस की जा रही थी – जैसे सबको किसी बड़े फैसले का इंतज़ार हो।
अहमद हुसैन क़ासमी, खादिम-ए-इमारत शरीअत के अनुसार, यह बैठक सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि उम्मत की रहनुमाई तय करने का ऐलानिया दिन है। इमारत शरीअत सौ साल से अधिक समय से मुसलमानों की सामाजिक, धार्मिक और क़ानूनी रहनुमाई कर रही है, लेकिन पिछले कुछ महीनों में इमारत अपने ‘अमीर’ को लेकर सुर्ख़ियों में रही।
बैठक को लेकर यह भी माना जा रहा है कि आज “सच” सामने आ जाएगा। यह स्पष्ट हो जाएगा कि किसका साथ उम्मत के हक में है और कौन इसे कमज़ोर करने की साज़िशों में शामिल है। सूत्रों के अनुसार, कुछ लोग मौजूदा अमीर और उनकी टीम से असहमत हैं, और सरकारी सिस्टम के कुछ एक्टिव लोग भी पर्दे के पीछे से दबाव बना रहे हैं।
इमारत-ए-शरीअत को दी जाने वाली यह आंतरिक चुनौती, सिर्फ एक संस्था के भविष्य का सवाल नहीं है, बल्कि बिहार, झारखंड और पूरे देश में मुस्लिम समाज की इत्तिहाद और इंक़िलाब की सोच का इम्तिहान भी है।
आज शाम तक, जब पर्दे उठेंगे, तो उम्मीद की जाती है कि सिर्फ नेतृत्व ही नहीं बल्कि इमारत की आत्मा को भी नया दिशा मिलेगा।
यह बैठक एक जम्हूरी प्रक्रिया है, लेकिन इसके फैसलों के मज़हबी, सामाजिक और राजनीतिक असरात दूर तक जाएंगे। मुस्लिम समाज की निगाहें इस वक़्त पटना की सरज़मीं पर टिकी हुई हैं।
दुआ है कि यह ऐतिहासिक बैठक इमारत-ए-शरीअत की उस रोशन विरासत को मज़ीद मजबूती दे, जिसकी बुनियाद मौलाना अबुल महासीं फैज अमीरी रह. ने रखी थी।

