कौन जानता है की मौत कहां खड़ी है और दलदल कहां है – रोज़गार की तलाश में तो निकलना ही पड़ता है।

जब तक हमारे नौजवान बमों के बीच रोटियाँ सेंकने को मजबूर हैं, तब तक आत्मनिर्भरता सिर्फ़ एक जुमला है।

भारत को अगर सच्चे मायनों में “विश्वगुरु” बनना है, तो पहले उसे अपने युवाओं को गुरबत, ग़ुलामी और गोली से आज़ादी दिलानी होगी।

बेरोज़गारी, बारूद और बेबसी के बीच फंसा भारतीय नौजवान

✍️ सैय्यद आसिफ इमाम काकवी

जब अपने देश में रोटी नहीं मिलती, तब नौजवान परदेस में बारूद के साये में रोज़गार चुनता है। आज जब ईरान-इज़राइल संघर्ष एक खतरनाक मोड़ पर है, तब यह सवाल और तीखा हो गया है क्या यही है हमारे भारत का सपना? भारत के लाखों युवा और मज़दूर खाड़ी देशों और इज़राइल जैसे अस्थिर क्षेत्रों में रोज़ी-रोटी की तलाश में जाते हैं। लेकिन क्या हमने कभी यह सोचा कि जब मिसाइलें गिरती हैं, बम फटते हैं, तब इन मज़दूरों की जान की क़ीमत कौन तय करता है? देश के गाँवों, कस्बों और छोटे शहरों में आज भी युवाओं को इज़्ज़त की रोटी, सुरक्षित नौकरी और बेहतर जीवन नहीं मिल पा रहा। ऐसे में मजबूरी उन्हें धकेलती है जंग के मैदानों की ओर, जहाँ ज़िंदगी हर वक़्त मौत से जूझती है। इज़राइल में आज भी हजारों भारतीय युवा काम कर रहे हैं, जिनकी ज़िंदगी एक छोटे से हमले या रॉकेट से खत्म हो सकती है। लेकिन क्या भारतीय दूतावास या सरकार की चिंता उन गुमनाम मज़दूरों के लिए भी वैसी ही है जैसी VIP पासपोर्टधारियों के लिए?
युद्ध किसका लेता है बलिदान?
हर युद्ध का सबसे बड़ा शिकार मज़दूर होता है। उसका नाम नहीं होता, उसकी तस्वीर नहीं होती, उसकी मौत पर चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज़ नहीं चलती। वो सिर्फ एक आंकड़ा बनकर रह जाता है। जंग किसी का हल नहीं होती, वो सिर्फ लाशें देती है — और सबसे पहले मज़दूर की। भारत को आत्मनिर्भर कहने से पहले ज़रूरी है कि यहां का युवा आत्मनिर्भर हो। उसे स्वदेश में ही रोज़गार, सम्मान और सुरक्षा मिले, न कि मौत के सौदे पर विदेश भेजा जाए। विदेश भेजना समाधान नहीं है, सम्मान देना समाधान है। आज की सबसे बड़ी ज़रूरत क्या है? सरकारों की प्राथमिकता सिर्फ़ विदेशी निवेश या आंकड़ों की बाज़ीगरी नहीं होनी चाहिए, बल्कि गाँव-कस्बों में युवाओं को रोज़गार देना होनी चाहिए। स्किल डेवलपमेंट सिर्फ़ पोस्टर का हिस्सा न हो, हकीकत में बदलाव लाए। भारत को अगर सच्चे मायनों में “विश्वगुरु” बनना है, तो पहले उसे अपने युवाओं को गुरबत, ग़ुलामी और गोली से आज़ादी दिलानी होगी। जब तक हमारे नौजवान बमों के बीच रोटियाँ सेंकने को मजबूर हैं, तब तक आत्मनिर्भरता सिर्फ़ एक जुमला है।

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