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प्राइवेट सिस्टम का खेल: आम आदमी की जेब पर हमला

भारत एक ऐसा देश है जहाँ शिक्षा और स्वास्थ्य को बुनियादी अधिकार माना जाता है। लेकिन जब यही अधिकार एक व्यापार का रूप ले लें, तो आम आदमी की जिंदगी में यह अधिकार बोझ बन जाते हैं।
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जाति की जंजीरें: आज़ादी के बाद भी मानसिक गुलामी आस्था पेशाब तक पिला देती है, जाति पानी तक नहीं पीने…

यह सवाल उठाता है कि यदि आस्था किसी बाबा की पेशाब को ‘पवित्र’ मान सकती है, तो एक दलित का पानी ‘अपवित्र’ कैसे हो सकता है? यह कैसा धर्म है?
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स्वार्थी मुसलमानों की महफील ईद मिलान में बिहार के मुख्यमंत्री सुसाशन बाबू नीतीश कुमार

अब नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री का चेहरा रखना भाजपा के लिए सम्भवता मुश्किल हो, परन्तु बिहार में भाजपा के पास मुख्यमंत्री का कोई चेहरा भी नही है।
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मौलाना अली हुसैन आसिम के जन्म दिवस को पसमांदा यौम-ए-इत्तेहाद (Solidarity Day) के रूप में मनाया जाए:…

जब दलित मुस्लिम, ओबीसी मुस्लिम और पसमांदा तबक़ात आला तालीम याफ़्ता होंगे, अपनी मजबूत तन्ज़ीम बनाकर बुनियादी और आइनी हुक़ूक़ के लिए मुत्तहिद होकर जद्दोजहद करेंगे।
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*एचकेआरएनएल कर्मचारियों की दुर्दशा: सरकारी व्यवस्था का एक और छलावा* 

सरकार को तुगलकी फरमान वापस लेना चाहिए और इन कर्मचारियों के लिए नौकरी की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। यदि सरकार इस दिशा में कदम नहीं उठाती, तो यह हजारों परिवारों की आर्थिक स्थिति पर गहरा प्रभाव डालेगा। 
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वक़्फ़ संशोधन बिल में केंद्र सरकार की एंट्री, हिन्दुराष्ट्र के प्रावधान की पहल?

सरकार का मुस्लिम रीत रिवाजो में व्यवधान डालना धीरे धीरे मुसलमानो के इस्लामी सासंस्कृति को समाप्त करने और दबा कर हिन्दुराष्ट्र के तहत हाशिये पर रखने का बहुत बड़ी साजिश तो नही?
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