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आज  स्वर्गीय श्री मंज़ुरुल हक की 4थी पुण्य तिथि के अवसर पर दुआओं की की दरखास्त

आज  स्वर्गीय  श्री मंज़ुरुल हक की 4थी पुण्य तिथि अवसर पर दुआओं की की दरखास्त ! अल्लाह उनकी मग़फिरत फरमाये और जन्नत उल फिरदौस मे आला मुक़म आता करे - अमीन!
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“सैनिकों का सम्मान: समर्पण और बलिदान की पहचान”

हमारे देश के सैनिक, जो सीमाओं पर अपने प्राणों की आहुति देकर हमारी रक्षा करते हैं, केवल वर्दी का बोझ नहीं उठाते, बल्कि वे हमारे चैन और स्वतंत्रता की सुरक्षा का भी भार संभालते हैं। ऐसे वीरों का सम्मान हमारा नैतिक और सामाजिक कर्तव्य है। यह…
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एक था पाकिस्तान: इतिहास के पन्नों में सिमटता सच

आखिर में, सिंदूर की सौगंध एक प्रतीक है - वह प्रतीक जो हमें यह याद दिलाता है कि हम अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए हर कुर्बानी देने को तैयार हैं। यह सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि एक वादा है
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क्या किसी की भूख की तस्वीर लेना जरूरी है? सोशल मीडिया युग में करुणा की कैद

सोचिए, अगर कोई कैमरा न हो, कोई दर्शक न हो, कोई ताली बजाने वाला न हो—क्या तब भी आप वही मदद करेंगे? यह प्रश्न हमारे भीतर झाँकने की ज़रूरत को इंगित करता है।
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सीमा पार क़ैद एक सिपाही: गर्भवती पत्नी की पुकार और हमारी चुप्पी

यह कहानी न तो किसी फिल्म की पटकथा है, न ही किसी काल्पनिक उपन्यास की घटना। यह आज के भारत की सच्चाई है, और सवाल यह है — क्या हम सब अब भी चुप रहेंगे?
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“नेताओं की देशभक्ति की अग्निपरीक्षा, सेना में बेटा भेजो, पेंशन लो!”

पेंशन कोई सम्मान नहीं, एक ज़िम्मेदारी होनी चाहिए – जो तभी मिले, जब परिवार भी राष्ट्र सेवा में उतरे। आम नागरिक के टैक्स पर ऐश करना बंद हो, अब बारी है नेता भी हिस्सा लें – सरहद पर, ज़मीन पर, और ज़िम्मेदारी में। वर्ना जनता सिर्फ सुनती रहेगी,…
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अंततः देश में जाति जनगणना: प्रतिनिधित्व या पुनरुत्थान?

वंचित समुदायों के लिए जाति जनगणना केवल गिनती नहीं है, यह उनकी दृश्यता का सवाल है। अगर समाज में कोई वर्ग आर्थिक, शैक्षणिक और राजनीतिक रूप से पिछड़ा है, तो सबसे पहले यह जानना ज़रूरी है कि वह है कहां? कितना है? डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था —…
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आंगन में खिलती छह ख़ुशियाँ: किसान राजेश के बच्चों की अनूठी शादी की कथा

बेटियों के विवाह की चिंता और बेटों के घर बसाने की योजना — यह सब किसी भी आम भारतीय पिता के जीवन का हिस्सा बनते हैं।
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यूपीएससी टॉपर या जाति टॉपर?: प्रतिभा गुम, जाति और पृष्ठभूमि का बाज़ार गर्म। 

हर दल, हर विचारधारा, हर वर्ग अपने-अपने टॉपर को पकड़कर झंडा उठाता है — “देखो, ये हमारा है!” किसी को सवर्ण गौरव चाहिए, किसी को दलित चमत्कार। और इस पूरे मेले में असली हीरो — यानी मेहनत और ईमानदारी — कहीं कोने में खड़ी, अकेली, उपेक्षित रह जाती…
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