*किसानों की आवाज बुलंद करना पुरूषोत्तम कौशिक की आजीवन प्राथमिकता रही*
लोभ, लालच सत्ता की धमक और चमक से प्रभावित हुए बिना, बिना कोई सैद्धांतिक समझौते के उन्होंने जीवन जीकर कबीर की इस पंक्ति को चरितार्थ किया- 'जस की तस धर दीनी चदरिया'।
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