बशीर बद्र को आख़िरी सलाम -उर्दू अदब का एक रोशन चिराग बुझ गया।

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,**तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।" - उर्दू को आसान शब्दों में पिरोना उनके हुनर का एक खूबसूरत नमूना उनकी शायरी में मिलता है। जिसे सुनने वाला अशिक्षित इंसान भी आसानी से समझले।

दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,** जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।” ** जी बहुत चाहता है सच बोलें,** **क्या करें हौसला नहीं होता।”

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उर्दू अदब का एक रोशन चिराग बुझ गया : बशीर बद्र को आख़िरी सलाम।

एस. ज़ेड. मलिक

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उर्दू शायरी की दुनिया के बेताज बादशाह, Bashir Badr अब इस दुनिया सराय फानी को अलविदा कह चुके हैं। 91 वर्ष की आयु में भोपाल में उनका निधन हो गया। उनके जाने से उर्दू अदब की दुनिया का एक ऐसा अध्याय समाप्त हुआ है, जिसने मोहब्बत, इंसानियत, यादों और रिश्तों को शब्दों की ऐसी ज़ुबान दी जिसे पीढ़ियाँ याद रखेंगी।

बशीर बद्र साहब की शायरी की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वे कठिन से कठिन भावनाओं को बेहद सरल शब्दों में बयान कर देते थे। उनके अशआर आम लोगों की ज़ुबान पर भी थे और साहित्यिक महफ़िलों की शान भी।

विदाई के मौके पर उनकी याद में
उनका यह मशहूर शेर आज उनकी रुख़्सती पर और भी अर्थपूर्ण लगता है—

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।

और फ़ना (नश्वरता) तथा जीवन की अस्थिरता को महसूस कराती उनकी शायरी की रूह कुछ यूँ महसूस होती है—

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।

एक ऐसा शायर जो हमेशा ज़िंदा रहेगा
बशीर बद्र साहब का जीवन संघर्षों से भरा रहा। मेरठ दंगों में उनका घर और अनेक अप्रकाशित पांडुलिपियाँ नष्ट हो गईं, लेकिन उन्होंने अपनी शायरी में कड़वाहट नहीं आने दी। उनकी ग़ज़लें हमेशा मोहब्बत, उम्मीद और इंसानी रिश्तों की बात करती रहीं।

उनके निधन पर गीतकार Javed Akhtar ने कहा कि “उर्दू ज़बान आज थोड़ी और ग़रीब हो गई।” यह श्रद्धांजलि इस बात का प्रमाण है कि बशीर बद्र केवल एक शायर नहीं, बल्कि एक युग थे।

श्रद्धांजलि
बशीर बद्र साहब, आप इस दुनिया से रुख़्सत ज़रूर हुए हैं, लेकिन आपकी ग़ज़लें, आपके अशआर और आपकी यादें हमेशा ज़िंदा रहेंगी।

“दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।”

अलविदा बशीर बद्र साहब।
उर्दू अदब आपको सदियों तक याद रखेगा। 🌹

यहाँ मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र साहब की याद में एक भावपूर्ण और गहरा दुख जो बयान नही किया जा सकता, उनकी की यादें कदम कदम पर यही कहेंगे-

बशीर बद्र की विदाई और एक सुनहरे दौर का अंत

> **”उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो**

> **न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाए”**

उर्दू अदब और ग़ज़ल की दुनिया का एक दमकता हुआ सूरज हमेशा के लिए अस्त हो गया। अपनी सादगी, गहरे जज़्बात और मख़मली लहज़े से करोड़ों दिलों पर राज करने वाले **डॉ. बशीर बद्र** अब हमारे बीच नहीं रहे। वे केवल एक शायर नहीं थे; वे आम इंसान के सुख-दुख, मोहब्बत और तन्हाई की चलती-फिरती आवाज़ थे। उनके जाने से उर्दू शायरी का वह दौर ख़त्म हो गया, जिसने ग़ज़ल को महफ़िलों की बंदिशों से निकालकर आम आदमी की बोलचाल का हिस्सा बनाया।

बशीर साहब, आपने कहा था कि उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो। यक़ीन मानिए, आपकी यादों के, आपके शेरों के उजाले आने वाली कई नस्लों का रास्ता रोशन करते रहेंगे। उर्दू अदब के इस शहंशाह को आख़िरी विदाई और खिराज-ए-अक़ीदत (भावभीनी श्रद्धांजलि)!

### ग़ज़ल को ‘आवाम’ तक पहुँचाने वाला मसीहा

बशीर बद्र साहब की सबसे बड़ी ख़ासियत यह थी कि उन्होंने शायरी को भारी-भरकम और क्लिष्ट शब्दों के बोझ से आज़ाद कराया। उन्होंने वही लिखा जो आम इंसान महसूस करता है। उन्होंने कभी ‘गुल-ओ-बुलबुल‘ की पुरानी कहानियों में वक़्त नहीं ज़ाया किया, बल्कि समकालीन समाज, इंसानी रिश्तों की कड़वाहट और मीठे अहसासों को पन्नों पर उकेरा।

* **सादगी में शिद्दत:** उनके शेर इतने सीधे दिल पर वार करते थे कि एक बार सुनने के बाद वे ज़हन से कभी नहीं निकलते।

* **गंगा-जमुनी तहज़ीब के अलमबरदार:** उनकी शायरी में भारत की साझी संस्कृति की ख़ुशबू रची-बसी थी। उन्होंने हमेशा दिलों को जोड़ने का काम किया।

**”कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से**

**ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो“**

# भोपाल से लेकर हर दिल तक का सफ़र

15 फरवरी 1935 को जन्मे बशीर बद्र (मूल नाम: सैय्यद मोहम्मद बशीर) ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पी-एच.डी. की और मेरठ कॉलेज में लंबे समय तक पढ़ाया। लेकिन उनकी असली पहचान मेरठ या भोपाल के मुशायरों तक सीमित नहीं थी। वे दुनिया भर में जहाँ भी उर्दू-हिंदी समझने वाले लोग हैं, वहाँ के चहेते बन गए।

साल 1999 में उन्हें उनके कविता संग्रह **’आस‘** के लिए **साहित्य अकादमी पुरस्कार** से नवाज़ा गया, और बाद में देश ने उन्हें **पद्मश्री** से भी सम्मानित किया। लेकिन उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान वह तालियाँ और आँसू थे, जो उनके एक-एक शेर पर मुशायरों में बरसते थे।

### आख़िरी दिनों की ख़ामोशी और मुकम्मल विदाई

ज़िंदगी के आख़िरी पड़ाव में अल्जाइमर (भूलने की बीमारी) के कारण बशीर साहब अपनी ही उन ग़ज़लों को भूल चुके थे, जिन्होंने दुनिया को दीवाना बनाया था। यह अदब की दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक था कि जिस शख़्स ने दुनिया को ज़ुबान दी, वह अपनी ही यादों के साए में ख़ामोश बैठ गया।

आज जब वे इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कह गए हैं, तो उर्दू अदब का हर पन्ना रो रहा है। लेकिन बशीर बद्र कभी मर नहीं सकते। वे ज़िंदा रहेंगे हर उस आशिक की आवाज़ में जो अपनी मोहब्बत का इज़हार करेगा, वे ज़िंदा रहेंगे हर उस तन्हा दिल की धड़कन में जो रात भर जागता है।

## बशीर साहब के कुछ अमर शेर, जो हमेशा गूँजते रहेंगे:

* **”दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,**

**जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।”**

* **”लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,**

**तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।”**

* **”जी बहुत चाहता है सच बोलें,**

**क्या करें हौसला नहीं होता।”**

आख़िरी सलाम

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